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After years of saying it wouldn't happen Brace yourselves: the Facebook “Dislike” button is coming.

Despite telling the public for a long time that the social network wasn’t planning to build a “dislike” button, a counter to its iconic “like” button, Facebook has apparently changed its mind. During a Q&A session Tuesday, CEO Mark Zuckerberg revealed his company has indeed been working on one.

“I think people have asked about the dislike button for many years. Today is a special day because today is the day I can say we’re working on it and shipping it,” he said.

Image: Time
Zuckerberg has admitted in the past that the company has considered building a Dislike button, but ultimately decided against it. Presumably, it had to do with the fact that at the time it didn’t want to integrate a way to express negativity toward other users, or create a system of upvoting or downvoting, as online news forum Reddit does.

“That isn’t what we’re here to build in the world,” Zuckerberg said on Tuesday.

However, Facebook does recognize that people sometimes want to express something other than “liking,” but are currently left with no truly good option.

“What they really want is the ability to express empathy. Not every moment is a good moment,” said Zuckerberg.

Source: TIME
नाम- मुस्लिम शेख.काम- हिट एंड रन हादसे का शिकार होने के बाद13 साल से बेरोजगार.


पता-गांव भरहापारा.जिला-बस्ती,यूपी। मुस्लिम को मैं पिछले पांच दिनो से ही जानता हूं। सेशनकोर्ट वाले फैसले के रोज ये पूरे समय मेरे साथ था। पूरी दुनियां मे बेहद दिलचस्पी और उत्सुकता के देखे जा रहे सलमान खान के केस के गवाहों का क्या हश्र हुआ है,मुस्लिम की जुबानी आपके साथ शेयर करना चाहता हूं। 28 सितंबर की रात ढाई बजे एक तेज धमाके की वजह से मुस्लिम की आंख खुली तो उसने अपने आपको एक बड़ी गाड़ी के नीचे पाया,पहले तो वो समझ नही पाया कि क्या हुआ लेकिन दर्द महसूस होने पर जब उसने नीचे देखा तो पाया कि उसके जांघ की हड्डी उपर उठ रही थी। मुस्लिम का फीमर(बायें जांघ की हड्डी) दो टुकड़े हो चुका था।सामने देखा तो सलमान खान गांडी के दरवाजे सेउतरकर भाग रहे थे। बाद मे मुस्लिम को मुबंई पुलिस म्यूनिसपेल्टी हास्पिटल बाबा मे ले गयी ,जहां डाक्टरों ने उसके पैर मे राड डाल दी।कुछ समय बाद वो अपने पैरों पे खड़ा हो गया।मुस्लिम को उसके मां-बाप घर ले आये। तेरह साल बाद भीउसके राड पड़ी हुई है मगर तकलीफ देती है,ज्यादा पैदल चले तो उसकी जांघों मे सूजन आ जाती है,ठीक से चल नही पाता,नतीजा कोई काम भी नही कर पाता क्योंकि मुस्लिम अनपढ़ है। इसबीच मुबंई पुलिस उसे एकबार गवाही के लिये बस्ती से मुबंई कोर्ट ले गयी और गवाही के बाद उसे लावारिस छोड़ दिया। पूरे डेढ़ दिन मुस्लिम मुंबई की सड़कों पर भूखा-प्यासा भटकता रहा,उसकी जेब मे पैसे नही थे,किसी तरह अपने गांव के एक परिचित के पास पहुंचा और उससे घर जाने के लिये पैसे मांगे तो उसने मुस्लिम को अपने मां-बाप से बात कराने को कहा,और एक हजार रूपये तब जाके दिये जब मुस्लिम के मां-बाप ने फोनपर वादा किया कि वो उसके नाम एक बीघा गांव की जमीन लिख देगें। मुस्लिम के बहन की शादी टूट गयी,उसकी दो बिनब्याही बहने हैं। मुस्लिम के खुद के भी दो बच्चे हैं,सबकी परवरिश उसके मां-बाप,कभी मजूरी करके तो कभी मांग के करते हैं या फिर मुस्लिम को कभी कोई हल्का काम मिल जाता है तब।

मैने मुस्लिम को अपने स्वार्थ के लिये संपर्क किया लेकिन जब उसकी दास्तान सुनी तो मैने कहा तुम लखनऊ आ जाओ, और कुछ तुम्हारे लिये कर पाऊं या नही तुम्हारा इलाज जरूर करवाउंगा। मुस्लिम जब लखनऊ आया तो उसे मै हास्पीटल ले गया,उसका एक्सरे हुआ.हड्डी जुड़ चुकी है, मगर राड उपर की मांसपेशियों से चिपट गया है, चलने पर या बांये करवट सोने पर तकलीफ देता है।ये तस्वीर उसी हास्पिटल की है,डाक्टर ने उसे दवा दी है, पेनकिलर और विटामिन है। मुस्लिम के पैर का आपरेशन करके उसकी राड निकाली जायेगी, फिर उसे इस तकलीफ से छुटकारा मिल जायेगा और वो नार्मल लाईफ जी सकेगा।डाक्टर ने उसे एक महीने के बाद बुलाया है इसीलिये तस्वीर मे मुस्लिम मुस्कुरा रहा है।

सलमान भाई आप भी मुस्कुराइये ना?


Source: Facebook (Mr. Anup Srivastava)



गर्व है हमें ऐसे कर्तव्य निसठ अधिकारी पर

मेरा नमन है

नवाबाद थानाक्षेत्र के मण्डी के पास चेकिंग के दौरान समर्थक की बाइक पकडे जाने पर झांसी में एक सपा नेत्री को गुस्सा आ गया। सपा की प्रदेष कार्यसमिति सदस्य दीपमाला कुषवाहा ने मौके पर पहुंचकर दारोगा ओ पी यादव को बाइक छोडने को कहा। दारोगा ने कागज अधूरे होने के कारण बाइक छोडने की बात नहीं मानी। इसके बाद गुस्साई सपा नेत्री ने दारोगा को कहा कि तुम नेतागिरी कर रहे हो। धमकी देते हुए कहा कि हिम्मत है तो चालान करके दिखाओं। इस पर दारोगा जी ने भी पलटवार करते हुए कहा कि मैं दारोगा हूं। हिम्मत रखता हूं और चालान कर सकता हूं। सपा नेत्री और दारोगा के बीच सडक पर चल रहे इस हंगामे को देखने के लिए आसपास के लोगों की भीड जमा हो गई। काफी देर तक चले हंगामे के बाद सपा नेत्री दारोगा को देख लेने की बात कहते हुए मौके से चली गई। बाइक के कागज कम होने के कारण दारोगा ने बाइक का चालान कर दिया।(धर्मेन्द्र सिंह द्वारा सूच्नार्थ)



छाती की बात 
..मोदी के भाषण के बाद मैने इंटरनेट को छान मारा कि पता चले कि छाती की औसत माप क्या होती है और आर्नोल्ड शेवनेगर की छाती कितनी चौड़ी है...पता चला कि औसत पुरुष की छाती की माप 36 से 42 इंच तक होती है. दुनिया में कभी बेहतरीन बॉडी बिल्डिंग के लिए चैंपियन बने आर्नोल्ड की छाती 57 इंच की रही है, जो एक विश्व रेकार्ड है..जबरदस्त मोटे व्यक्ति की छाती का रिकार्ड 72 इंच का है.. मोदी जी की छाती की माप कितनी है ये पता नहीं.. 56 इंच चौड़ी छाती से उनका आशय क्या था ये तो पता नहीं..हो सकता है उनका भाषण लिखने वाले ने इंटरनेट से कुछ गलत तथ्य नासमझी में लिख डाला हो ..हमेशा की तरह मोदी जी ने इस पढ़ भी डाला हो. या शायद उन्होंने ये कहने की कोशिश की असल में छाती जितनी भी होती है..उसका एक अदृश्य विस्तार भी होता है.




दो दिनों से दिल्ली की सड़कों पर आम आदमी कुछ ख़ास देख रहा है..। जो पुलिस की चौखट से लेकर सरकार के हर दर पर मेमना बनने के लिए मजबूर हैं उनके विद्रोह के नारों में टीवी स्टूडियो के सुपर स्टार दरबारी गायकों सरीखे कर्णप्रिय सुर नहीं खोज पा रहे..। मीडिया के माइकों से भाग्य विधाता पत्रकार जनतंत्र के गीत गाते दिख रहे हैं..। दोनों से ताल्लुक रखने वाला मैं मूक ही रहता लेकिन जब विजय विद्रोही जी को एबीपी न्यूज़ पर डिक्शनरी खोलकर ‘anarchy’ की परिभाषा देते देखा तो रहा नहीं गया..। नाम विद्रोही होने पर भी वो ये नहीं समझ पाए कि इस शब्द के मायने शब्दकोष में नहीं इतिहास में खंगालने की ज़रुरत है..। 6 सदी ईसा पूर्व चीन में TAOISM के जनक लाओत्सु इस थीम के पहले प्रणेता कहलाते हैं..। उनके बाद के इसी लीक के दार्शनिक झुआंगजी ने लिखा, ‘एक छोटा चोर जेल जाता है, बड़ा चोर देश चलाता है..।’ क्या ऐसा नहीं लगता ये एक परिभाषा 65 सालों में पनपी हमारी व्यवस्था के लिए ही कही गई हो..? उस हिसाब से तो जेपी, अरविंद केजरीवाल असल में इस संस्थागत ANARCHY को तोड़ने वाले विरले नेता साबित होते हैं..। Georges Lechartier लिखते हैं- “The true founder of anarchy was Jesus Christ and ... the first anarchist society was that of the apostles.” बोल्शेविक क्रांति शायद ANARCHISTS के बिना कभी मुमकिन नहीं होती..। एक बार फिर हमारे हालात की याद आती है जब आप ये जानते हैं कि ANARCHIST शब्द का इस्तेमाल भर्त्सना के तौर पर पहली बार 1642 में अंग्रेज़ी गृहयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के रजवाड़ों ने संसद के लिए लड़ रहे ‘ROUNDHEAD’ क्रांतिकारियों के लिए किया था..। अफसोस ये है कि इस बार भी इतिहास खुद को सिर्फ दोहराता दिख रहा है..जबकि हमारे देश में पहली ज़रुरत इसे रचे जाने की है..। लेकिन सवाल ये है कि इस बदलाव उम्मीद किससे रखें..? जिन्हें अरबों की फीस पर काम करने वाली प्रचार कंपनियां..सजीले मंचों पर मसीहा का मुखौटा पहनाकर पेश करती हैं..उनका इतिहास कमज़ोर है और वर्तमान संदेहास्पद..। मीडिया के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना अच्छा..। आज सुबह धरनास्थल पर शौचालय खोज रहे केजरीवाल के मुंह में मीडिया ने माइक ठूंसा तो वो बोले, मीडिया को क्या हो गया है, ज़्यादातर पत्रकार अच्छे हैं, लेकिन उनके मालिक बीजेपी या कांग्रेस के हाथों बिके हैं..। सबने बयान चलाया लेकिन बेहद सफाई से मालिक वाली बात काटकर..। इतनी सी बात ही उसके समाज की आत्मा के रक्षक, 'CONSCIENCE KEEPER OF SOCIETY' होने के दावे की पोल खोलती है..। दो-तीन दिन पहले सीएनएन-आईबीएन और एनडीटीवी केजरीवाल का इंटरव्यू ले उड़े और एबीपी को नहीं मिला..। इसके बाद आप केजरीवाल के लिए इस चैनल के बदले सुर देख सकते हैं..। TIMES NOW की भी यही कहानी है..। आप जो टीवी पर देखते हैं, सुनते हैं..उसे बोलने, लिखने वाले भी उसी मिडल क्लास का हिस्सा हैं, जिसकी स्वार्थपरता पर दुनिया भर के समाजशास्त्री आपको एकमत मिलेंगे..।

मैंने सुना है अंधों के एक गांव में जब दुर्घटनावश एक आंख वाला फंस गया तो अंत में उसे भी अपनी आंखें निकलवानी पड़ीं..। क्योंकि बाकी सब लोग अगर कोई इकलौता सच देख पाए थे तो वो था अंधकार..। इतने आतातायी देखने के बाद अब इस देश की आत्मा ही शासित हो गई लगती है..। गोरे हों या काले..हुक्मरानों को ‘भाग्य विधाता’ के तौर पर देखने के आदी हो गए हैं हम..। यहां तक कि टैगोर जैसा दिमाग भी जॉर्ज पंचम के बारे में ऐसा ही गीत लिखता है..और हम उसे खुशी-खुशी राष्ट्रगीत भी बना लेते हैं..। कमज़ोर शासकों ने इतनी बार लुटवाया कि हिंदुस्तान की यही शासित आत्मा अब किसी ‘अधिनायक’ के लिए तड़पती जान पड़ती है..। आत्मा की इसी गुलामी से पनपे वो मस्तिष्क भी हैं जो टीवी चैनलों की मोटी सैलेरियों और अपनी अभिप्साओं के गुलाम हैं..। इसीलिए जब केजरीवाल यमदूत जैसे अंगरक्षकों से घिरे नहीं दिखते, जब वो लुटियन्स दिल्ली के खाए अघाए लोगों की करताल के बीच रिबन ना काटकर लोगों के बिजली कनेक्शन जोड़ते दिखते हैं तो गुलाम दिमाग उन्हें नेता ही स्वीकार नहीं कर पाते..। इसीलिए जब वो आम इंसान की तकदीर को फाइलों के जाल से निकालकर फैसलाकुन जंग में ले जाना चाहते हैं तो लोगों को लगता है कि वो प्रशासक नहीं, आंदोलनकारी हैं..। ज़रा सोचकर देखिएगा..आंदोलनकारी ही सच्चे शासक हो सकते हैं..। अन्यथा राजतंत्र को उखाड़ने की क्या ज़रुरत पड़ती..? अन्यथा पढ़ी लिखी ब्यूरोक्रेसी को ही इस देश का शासन क्यों ना सौंप दिया जाता..? अन्यथा दुनिया का मन मोहने वाले अर्थशास्त्री..इस देश में इतना ऐतहासिक अनर्थशास्त्र ना लिखते..। 

अगर एमसीडी की छत पर करीब 500 करोड़ का हैलीपैड सिर्फ मुख्यमंत्री के हैलीकॉप्टर के लिए बनता है तो वो हमारे नेताजी की कार्यकुशलता के लिए ज़रुरी कहलाया जाता है..। लेकिन जिस जनता का सचिवालय है (जिसके मेनगेट को 15 साल बाद जनता के लिए खोलने के लिए एक पूरा दिन लग जाता है!) अगर वो उसके आंगन में घुस आती है तो मेरे प्रबुद्ध मित्र भी कहते हैं लोकतंत्र की गरिमा का हनन हो गया..! एक एसएचओ जब झुग्गियों की औरतों को पीटने से पहले वारंट तो क्या, इंसानियत के तकाज़े को भी ठेंगे पर रखता है, तब आवाज़ भी नहीं उठती..। लेकिन वही एसएचओ जब हर कानून से ज़्यादा हफ्ते की ग्राहकी की फिक्र में मंत्री तक को अनसुना कर देता है तो संविधान के अनुच्छेद, धाराएं, वाक्य, शब्द तक पर ब्रह्मज्ञान देने वाले खड़े हो जाते हैं..। हां, नस्लवाद स्वीकार्य नहीं हो सकता..। लेकिन क्या हम ये स्थिति स्वीकार कर लें जहां दिल्ली ही नहीं देश के हर नागरिक के लिए फैसला करना मुश्किल हो कि वो रक्षकों से ज़्यादा डरे या भक्षकों से..? एक मंत्री का शीशा टूटे तो दर्जन पुलिसवाले सस्पेंड हो जाएं लेकिन एक औरत को ज़िंदा जला दिया जाए..तो संविधान की धाराओं को इंसाफ की राह का रोड़ा बना दिया जाए..?

लोकतंत्र बहुमत पर भले ही चले..लेकिन क्रांतियों को कभी बहुमत की ज़रुरत नहीं पड़ी..। माओ, लेनिन से लेकर कास्त्रो तक इतिहास उठाकर देख लें..बदलाव के बीज सदैव अल्पमत ने ही बोए..। बाज़ारवाद जिस दौर का आधार हो, वहां शायद अल्पमत में रहना, सच की ज़्यादा बड़ी मज़बूरी है..। लेकिन ये देश एक अहम दोराहे पर है..। एक ओर ऐसा विचार है जो कहता है कि मुझे ताकत दो ताकि आपका ‘भाग्य विधाता’ बनूं..। और दूसरी ओर ये ख्याल कि आप तक ताकत पहुंचेगी..ताकि आपका मुस्तकबिल आपके हाथ हो..। मेरे पसंदीदा ब्रेख्त के शब्दों में- “बशर्ते तय करो- किस ओर हो तुम”..!




मां गंदा सा मफलर दे दे केजरीवाल बन जाऊं,
झाड़ू लेकर हाथ में तेरी भ्रष्टाचार मिटाऊं।
एक गंदा सा एक स्वेटर दे दे पहन के उसको जाऊं,
खांस-खांस कर सबसे बोलूं भ्रष्टाचार मिटाऊं।
पढ़-लिख कर क्या होगा मां तू रखदे सभी किताबें,
तू तो बस बाजार से मुझको टोपी एक दिलवा दे।
पढ़-लिखकर भी केजरीवाल बस एक नौकरी पाए,
लेकिन चमका तभी सितारा, जब झाड़ू अपनाए।
अन्ना जी के मंच पे चढ़कर कर दिया सबको ढीला,
बीजेपी को मात दे गए डर गईं इनसे शीला।
आज बैठकर दिल्ली में वो कर रहे हैं नौटंकी,
बिजली देंगे और पानी से भरेंगेसबकी टंकी।
टी.वी पर दिन रात दिख रहे, गुम शाहरुख-सलमान,
झाड़ू थाम के भी मिल सकता है गर इतना सम्मान।
तो फिर काहे रात को जग कर पढ़-पढ़ आंखें फोढ़ूं,
मैं भी क्यों न झाड़ू लेकर उनके साथ ही दौड़ूं....।।

From: Piyusha Jha


कांशीराम के बेडरूम में घुसने पर झापड़ खाने वाला आशुतोष पूछ रहा कि फोन करने का ये कोई टाइम है!

अभी मैंने आशुतोष को फोन किया. आईबीएन7 वाले को. तो भाई ने बोला कि ये कोई टाइम है फोन करने का. मैंने पूछा- ''भइया, हां या ना में बता दो कि इस्तीफा दिया है या नहीं, क्योंकि आपकी विदाई की फोटो शेयर हो रही है फेसबुक पर''. तब भी भाई मुझे घुड़कता रहा, बोलता रहा कि... ''ये कोई टाइम है भला फोन करने का''.

हद है यार.

ये वही आशुतोष भाईसाहब हैं जो बिना बुलाए दिन दहाड़े कांशीराम के घर में ही नहींबल्कि बेडरूम में घुस गए थे और झापड़ खाकर बाहर निकले थे. और, उसी के बाद एसपी सिंह के रहमोकरम पर पत्रकार बन गए थे. पर अब यही महोदय खबर के लिए फोन किए जाने पर समय का हवाला दे रहे हैं.

बताया जा रहा है कि ये आशुतोष महाशय आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लडेंगे लोकसभा का, इसलिए पत्रकारिता नामक महान पेशे का दिल पर पत्थर रखकर महान त्याग किया है. अगर ऐसे लोगों ने आम आदमी को चपेटे में ले लिया तो खून चूसने वाले जंगली छोटे जानवरों के जीवन का क्या होगा और उन मोटे जानवरों के खून का क्या होगा जिसका इंतजार जंगली छोटे खूनपिस्सू प्राणी करते हैं.. लगता है प्रकृति का संतुलन गड़बड़ाने वाला है...

पता नहीं अरविंद केजरीवाल के पास कोई छननी बची है या नहीं या फिर दिल्ली प्रदेश में चुनाव जीतने के बाद इन 'आप' वालों की छननी छलनी-छलनी हो चुकी है... जो भी हो, वे खुद जानें.. लेकिन सैकड़ों मीडियाकर्मियों की नौकरी खाने वाले आशुतोष जैसे कार्पोरेट संपादकों की जगह आम आदमी पार्टी में हो गई तो भगवान जाने ये पार्टी कैसे आम आदमी की रह पाएगी....

सुना तो ये भी है कि आम आदमी पार्टी वाले अब अपने यहां जहाज कंपनियों के प्रबंधकों से लेकर बैंकरों तक और माफियाओं के परिजनों से लेकर पुराने गिरहकटों तक को टिकट देने को तैयार बैठे हैं. अगर ये सच है तो हम सब कुछ दिन बाद आम आदमी पार्टी के पर्चे को जहाज बनाकर आने वाले बरसात में अपने अगल-बगल की चोक गलियों नालियों में बहाया-भगाया करेंगे... या फिर उसे इतिहास अतीत की बातें मानकर रद्दी के भाव कबाड़ी साथियों को बेच बैठेंगे, ताकि किसी गरीब का तो घर चले...
पढ़ते रहिए डंके की चोट पर...

From: bhadas4media.com 
Via: Pashyanti Shukla


पार्टी का सम्मान विचारधारा से और सरकार का सम्मान निष्पक्ष विकास कार्यों और सटीक निर्णयों से होता है।

यदि हम सकारात्मक रूप से ये जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि आज "आप " ने क्या किया और यदि हम ... "आप " को एक विचार, बल्कि क्रांतिकारी विचार के रूप में मानते हैं ... , तो हमें व्यवहारिक सोच का विकास करना होगा जिसमें बंगले - गाड़ी के प्रयोग से अधिक-- इस बात पर विचार करना होगा कि यदि हमें स्वयं सुपर मैन की तरह काम करना पड़ जाए तो क्या हम बिना विशेष सुविधा के 'सुगम रूप से' काम कर पाएंगे ?
ज्यादा दूर मत जाइये, अपने घर में पड़ गयी शादी या किसी बड़े समारोह को याद कीजिए विशेषकर दिल्ली जैसी जगह पर। जब आपको बहुत सारे काम एक साथ भी करने होते थे और गुणवत्ता की चिंता भी थी। कितनी परेशानी उठानी पड़ी होगी आपको जब ज़रुरी सुविधा नदारद रही हो। लेकिन हम हैं कि खाना बनाने के लिए लगी (अच्छी) आग के धुंए को देखकर चिल्लाने लगे कि शहर में आग लगी है।

ख़ैर, अभी कहीं ये भी सुनने को मिला। …… जो पहली बार बहुत अच्छा लगा एक विचारधारा के रूप में- चाहे किसी ने भी कहा हो
नेता A > मैं फ्री भोजन दूंगा - मैं फ्री पानी दूंगा
नेता B >न मैं मुफ्त पानी की बात करूँगा , ना मुफ्त भोजन की बात करूंगा , मैं इतने रोजगार पैदा करूँगा, युवाओं को इतना सक्षम कर दूंगा, कि मेरे देश का एक-एक युवा लेने वाला नहीं, लोगो को देने वाला बने.

पार्टी का सम्मान विचारधारा से और सरकार का सम्मान निष्पक्ष विकास कार्यों और सटीक निर्णयों से होता है।

From: Ruma Verma

A Hindu saint, who was visiting river Ganges to take bath, found a group of family members on the banks, shouting in anger at each other. He turned to his disciples smiled and asked. "Why do people shout in anger shout at each other?" Disciples thought for a while, one of them said, "Because we lose our calm, we shout." "But, why should you shout when the other person is just next to you? You can as well tell him what you have to say in a soft manner," asked the saint. Disciples gave some other answers but none satisfied the other disciples. 

Finally the saint explained... "When two people are angry at each other, their hearts distance a lot. To cover that distance they must shout to be able to hear each other. The angrier they are, the stronger they will have to shout to hear each other to cover that great distance. What happens when two people fall in love? They don’t shout at each other but talk softly, Because their hearts are very close. The distance between them is either nonexistent or very small…" The saint continued, "When they love each other even more, what happens? They do not speak, only whisper and they get even closer to each other in their love. Finally they even need not whisper, they only look at each other and that’s all. That is how close two people are when they love each other." 

He looked at his disciples and said. "So when you argue do not let your hearts get distant, Do not say words that distance each other more, Or else there will come a day when the distance is so great that you will not find the path to return."



देश बदल रहा है...दांव बदलिए 
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घर से गांधीनगर एअरपोर्ट और वहां से उड़कर दिल्ली एअरपोर्ट. फिर हेलीकाप्टर से रैली स्थल के हेलिपैड पर . हेलिपैड से रैली के मंच पर. ४५-५० मिनट के अखिल भारतीय लाइव प्रवचन के बाद फिर मंच से वापस उन्ही रास्तों से होते हुए गांधीनगर के अपने घर.

जनता तक पहुँचने का ये तरीका कुछ महीने चल सकता है. चला भी है. टीआरपी भी मिली है और समर्थन भी. नेता भी पसंद किया गया है और प्रवचन का अंदाज़ भी. लेकिन देश की बदली राजनितिक सोच में ये तरीका अब थक रहा है. अब टीआरपी कम हो रही है. कवरेज घट रही है. अखिल भारतीय लाइव प्रवचन का समय भी घट रहा है. प्रवचन के बीच कामर्शियल ब्रेक भी आ रहे हैं.

भगवा मित्रों लोकसभा का दंगल अगर जीतना है तो नेता को दांव बदलना होगा. आसमान से सीधे मंच पर नही ...अब जनता के बीच सड़क पर उतरना होगा...गलियों से गुजरना होगा ...गाँव में जाना होगा. पुष्पक विमान से इस देश में राम राज नही आता ...राम राज लाना है तो धरती पर रथ उतारना होगा ....क्यूंकि दिल्ली में रामलीला का मंच अब किसी और ने छीन लिया है.

राजनीती का तरीका अब बदल रहा है ...जो अब नही बदला तो उसे वक़्त बदल देगा...चार महीने का वक़्त है ...दांव बदलिए वर्ना बाज़ी हाथ से निकल सकती है.


From: Deepak Sharma

!!! भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए 
एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग!!!

‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।

अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है। इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।

डच एनजीओ ‘हिवोस’ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं। इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। 
दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है।

‘सीएनएन-आईबीएन’ व ‘आईबीएन-7’ चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ करती है जो ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार के लिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर फंडिंग करती है।

माना जा रहा है कि ‘पनोस’ और ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ व हिंदी चैनल ‘आईबीएन-7’ न केवल अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ने’ में सबसे आगे रहे हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी ‘जीएमआर’ भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।

‘जीएमआर’ के स्वामित्व वाली ‘डायल’ कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सीएजी’ ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। 

इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ा’ है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।

……शेष अगले पोस्ट में..!!!

 (लेखक बीजेपी से जुड़े हैं)



हम भुगत रहे हैं नेहरू के पाप का फल प्रभात रंजन दीन



जब तक वे नेता थे तब तक तो वे भी वैसे ही थे, लेकिन जबसे राष्ट्रपति बने हैं, प्रणब मुखर्जी अपनी साहसिकता की छवि देश में स्थापित कर रहे हैं। जो काम प्रधानमंत्री को करना चाहिए, जो काम देश के रक्षा मंत्री को करना चाहिए, वह काम देश के राष्ट्रपति को करना पड़ रहा है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन हमें 1962 से लगातार अपमानित कर रहा है, लेकिन हमारे नेताओं ने बेशर्म होने की दवा खा रखी है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर मौजूदा मनमोहन सिंह तक। देश के स्वाभिमान की इन्हें कोई चिंता ही नहीं। नेहरू और मनमोहन दोनों में एक समानता है। दोनों ने ही मैडम के चक्कर में देशहित को ताक पर रख दिया। नेहरू ने मैडम माउंटबेटन के चक्कर में देश को डुबोया और मनमोहन मैडम सोनिया की खैरख्वाही में देश को डुबो रहे हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अरुणाचल प्रदेश जाकर जब यह कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और महत्वपूर्ण हिस्सा है तो देश के लोगों के धिकते कलेजे को जैसे ठंडक मिली। चीन की हिमाकत यह रही है कि भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति अरुणाचल प्रदेश जाएं तो वह आंय-बांय-शांय बोलता रहता है। भारतीय सीमा में घुस कर चीन की सेना कैसी हरकतें करती है, इस बारे में पूरा देश जानता है। ऐसे में जब प्रणब मुखर्जी ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश को अब सुदूर क्षेत्र नहीं समझा जाना चाहिए, तो इस भाषा का संदेश चीन तक जरूर पहुंचा होगा। चीन के नेता भारतीय नेताओं की तरह बुद्धिहीन और दृष्टिहीन तो हैं नहीं कि उन्हें प्रणब की बात न समझ में आए। राष्ट्रपति ने अरुणाचल प्रदेश विधानसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत की सम्प्रभुता से जुड़ा प्रदेश है। आपको याद ही होगा कि कुछ ही साल पहले वर्ष 2009 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणाचल यात्रा पर चीन ने तल्ख टिप्पणी की थी। प्रणब की यात्रा पर इस बार भी चीन खुद को रोक नहीं सका लेकिन थोड़ी नियंत्रित भाषा में बोला कि भारत को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे सीमा विवाद का मसला और उलझे। साफ है कि प्रणब के बयान में जो धमकी थी कि अरुणाचल को दूर न समझें, तो चीन ने भी सांकेतिक धमकी ही दी। मनमोहन अभी हाल ही में चीन की यात्रा पर गए थे लेकिन वहां जाकर भी अरुणाचल के लोगों के लिए चीन द्वारा नत्थी वीज़ा जारी किए जाने की हरकतों पर कुछ नहीं कहा। ऐसे ही डरपोक लोग भारत की सत्ता संचालित करते हैं। ऐसे में देश के राष्ट्रपति का यह बयान एक साहसिक और सार्थक कदम है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाकारेपन के कारण 1962 के युद्ध में चीन ने हमें पराजित किया और हमारे 90 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा जमा कर बैठ गया। इसके अलावा पाकिस्तान ने अक्सई चिन की 5180 वर्ग किलोमीटर की भारतीय भूमि चीन को 'गिफ्ट' में दे दी, जैसे यह हिस्सा पाकिस्तान की बपौती का था। फिर भी भारतवर्ष के नेताओं को शर्म नहीं आई। अब केंद्रीय सत्ता के गलियारे में यह सुगबुगाहट चल रही है कि अरुणाचल प्रदेश के चीनी कब्जे वाले हिस्से या अक्सई चिन के हिस्से में से कोई एक चीन को दे ही दिया जाए और विवाद सुलटाया जाए। विवाद हटाने का तो सबसे उत्तम तरीका है दुश्मन के सामने लेट जाइए। ...और ऐसा करने में भारतीय राजनीतिकों को विशेषज्ञता हासिल है। अगर यह सुगबुगाहट ठोस शक्ल लेती है तो भारत के लिए कितनी शर्मनाक बात होगी! विदेश मंत्रालय के कुछ अधिकारी भी कहते हैं कि अगर चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा छोड़ दे, तो भारत उसे अक्सई चिन देने के लिए तैयार है। अपने ही देश का वह हिस्सा जो चीन के कब्जे में है उसे पाने के लिए भारतवर्ष अगर जम्मू-कश्मीर के लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में चीन के कब्जे वाले 38 हजार वर्ग किलोमीटर (पाकिस्तान द्वारा दी गई 5180 वर्ग किलोमीटर जमीन मिला कर कुल 43180 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र पर अपना दावा छोड़ देने पर विचार कर रहा है... तो फिर बचेगा क्या? भारत का संवेदनशील उत्तरी सीमाई क्षेत्र चीन के कब्जे में चला गया तो वह और पाकिस्तान मिल कर हमें बुरी तरह मारेगा। इतनी भी सामान्य भौगोलिक-रणनीतिक समझ हमारे देश के नेताओं में नहीं है। अभी ही पाकिस्तान और चीन मिल कर भारत के लिए नई-नई परेशानियां खड़ी कर रहा है। उसके बाद क्या होगा? चीन की निगाह तवांग पर है। यह निगाह इसलिए है कि चीन के सत्ताधीशों में भौगोलिक-रणनीति के पेचोखम की समझदारी है। तवांग एक तरफ भूटान और दूसरी तरफ तिब्बत से जुड़ा है। यानी चीन तवांग हासिल कर भूटान को भी अपने अरदब में रखना चाहता है और किसी समय मौका देख कर भूटान को भी तिब्बत बना देना चाहता है। इतिहास के पन्ने पर एक तरफ नेहरू जैसा राष्ट्राध्यक्ष है तो दूसरी तरफ चाउ एन लाई। नेहरू माउंटबेटन के लिए देश को विभाजित करने के लिए तैयार हो जाता है तो चाउ एन लाई ब्रिटिश भारत के तत्कालीन सचिव हेनरी मैकमॉहन द्वारा निर्धारित सीमा रेखा को मानने से इन्कार कर देता है। 1914 भी एक शिमला समझौता हुआ था जिसमें तिब्बत के साथ हेनरी मैकमॉहन ने सीमांकन समझौता तय कराया था। चीन इस समझौते को खारिज करता है क्योंकि चीन ने तिब्बत को सम्प्रभु के रूप में कभी माना ही नहीं। चीन बदतमीजी से अरुणाचल प्रदेश को भी दक्षिणी तिब्बत बताता है। और भारत का नेतृत्व इस सम्बन्ध में उसी भाषा में कोई जवाब नहीं दे पाता न ही कभी सैन्य कार्रवाई के लिए कोई कदम उठाता है। चीन भारत में घुसता ही जा रहा है और भारत का नेता बेबस और नपुंसक। इतिहास के पन्नों में झांकें तो पाते हैं कि 1950 में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद जब 1959 में विद्रोह गहराया तब भारत ने दलाई लामा को राजनीतिक शरण दी थी। इस पर चीन भड़क गया था और भारत-चीन सीमा पर हिंसक घटनाएं शुरू कर दीं। यह 1962 में बाकायदा आक्रमण के रूप में सामने आया। चीन की तैयारी और उसकी कुदृष्टि पहले से थी। भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन के धूर्त और झूठे नेताओं के झांसे में आकर 1954 में पंचशील समझौता कर लिया था। इस समझौते का भारत को तो कोई लाभ कभी नहीं मिला, लेकिन चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति को सफल करने में इसका पूरा लाभ उठाया। बाबा साहब अम्बेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे तमाम शीर्ष नेताओं ने नेहरू को पंचशील समझौता करने से रोका था, लेकिन वे माने नहीं। देश इन्हीं भूलों को भुगत रहा है। हालात यह है कि लोभी चीन केवल तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश ही नहीं, बल्कि सिक्किम, भूटान, नेपाल और लद्दाख तक को अपना हिस्सा बताता है। दलाई लामा की आत्मकथा 'मेरा देश निकाला' आप पढ़ें तो तिब्बत की भयानक त्रासदी आपके रोंगटे खड़े कर देगी। नेहरू की अदूरदर्शिता के कारण तिब्बत चीनी भेडिय़ों का शिकार हो गया। लेकिन फिर भी नेहरू को अपनी गलतियों का एहसास नहीं हुआ। जब दलाई लामा ने निर्वासन में तिब्बत सरकार का गठन करने की इच्छा जाहिर की थी तो नेहरू ने उन्हें डांट कर कहा था, 'हम आपकी सरकार को मान्यता नहीं दे सकते।' शांति के दूत नेहरू का यह स्वरूप था। इस अदूरदर्शी स्वरूप और समझ का खामियाजा भारत को भी भुगतना पड़ा और पंचशील समझौते को ठेंगे पर रखते हुए 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया और भारत की हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा जमा लिया। अब तो बहुत देर हो चुकी है। तिब्बत आज भी खून के आंसू रो रहा है, चीन की राक्षसी वृत्ति आज भी जारी है, नेहरू के पाप का फल हम आज भी भुगत रहे हैं...

Prabhat Ranjan Deen







Actor Paul Walker — a self-styled adrenaline junkie best known for his role in “The Fast and the Furious” movies — was killed  fiery single-car wreck in Southern California.
The red Porsche GT about 3:30 p.m. when the sports car flew off the road and slammed into a tree in Santa Clarita.


Actor Paul Walker — a self-styled adrenaline junkie best known for his role in “The Fast and the Furious” movies — was killed fiery single-car wreck in Southern California. The red Porsche GT about 3:30 p.m. when the sports car flew off the road and slammed into a tree in Santa Clarita.









From BBC (http://www.bbc.co.uk/news/world-us-canada-25173331)
US actor Paul Walker, who starred in the Fast & Furious series of action films, has been killed in a car crash in California.
Walker, 40, was a passenger in a Porsche sports car driven by a friend - who also died - when it crashed north of Los Angeles.
Walker was said to be attending a charity event at the time.
He starred in all but one of the films in the Fast & Furious franchise, the sixth of which opened in May.
Walker also starred in the suspense drama Hours, a movie that is set for release this month.
The Los Angeles County Sheriff's department said the crash happened in the community of Valencia.
Wreckage of Porsche sports car that crashed into a lamp post in Valencia, Los Angeles. 30 Nov 2013
The red Porsche crashed into a lamp post in Valencia, north of Los Angeles
Wreckage of Porsche sports car that crashed into a lamp post in Valencia, Los Angeles. 30 Nov 2013
The sports car burst into flames after the crash
It said deputies found a car engulfed in flames when they responded to a report of a collision. Two people found in the car were pronounced dead at the scene.
Images showed the burned-out wreckage of a red Porsche by the side of the road.
"It is with a truly heavy heart that we must confirm that Paul Walker passed away today in a tragic car accident while attending a charity event for his organisation Reach Out Worldwide," the statement on the actor's Facebook page said.

“
Start Quote

Heaven has gained a new Angel. Rest in Peace”
Vin DieselFast & Furious co-star
"He was a passenger in a friend's car, in which both lost their lives. We... are stunned and saddened beyond belief by this news.''
Universal Pictures also issued a statement, saying studio staff were "heartbroken" by Walker's death.
"Paul was truly one of the most beloved and respected members of our studio family for 14 years, and this loss is devastating to us, to everyone involved with the Fast & Furious films, and to countless fans.
"We send our deepest and most sincere condolences to Paul's family."
Walker played undercover agent Brian O'Conner in the Fast & Furious movies.
The first film of the franchise was released in 2001 and the seventh is in development.
Walker was one of the leading protagonists, along with Vin Diesel and Michelle Rodriguez.
Diesel said in a post on Instagram: "Brother I will miss you very much. I am absolutely speechless. Heaven has gained a new Angel. Rest in Peace."
Paul Walker (r) and Vin Diesel
Walker's co-star Vin Diesel (left) said the actor's death had left him 'speechless'
Another Fast & Furious star, the rapper Ludacris, wrote: "Your humble spirit was felt from the start, wherever you blessed your presence you always left a mark, we were like brothers."
Walker began acting as a young boy when his mother, a model, took him to auditions for commercials.
After drifting away from acting, he got his big break when a casting director remembered him from years before, tracked him down and gave him a role in the TV series Touched by an Angel.
Walker later won a recurring part in the soap The Young and the Restless before moving on to supporting roles in teen films in the late 1990s with Varsity Blues, She's All That and The Skulls.
After the success of the first Fast & Furious film, Walker became the leading man for the second instalment when Vin Diesel dropped out.
Fast & Furious 6
The sixth instalment of the Fast & Furious franchise topped the US box office
Diesel later returned, however, and the six-film franchise has earned an estimated $2.4bn (£1.5bn) at global box offices. The series has not lost its appeal, with the latest instalment, the sixth, the most lucrative so far.
The seventh instalment began filming in September but has not been completed. It had been scheduled for release in July.
Walker has also filmed Hurricane Katrina drama Hours, which is due to be released on 13 December.
Another forthcoming film is Brick Mansions, a remake of the French action film District B13, for film studio Relativity.
Relativity President Tucker Tooley said in a statement: "Paul was an incredibly talent artist, devoted philanthropist and friend."
Kashmir is bestowed with the nature's best. Although terror has gripped the place for past few decades, still it has not lost her sheen. One finds beutiful locales and splendid places.

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Gulmarg during winter
Nishat Bagh, Srinagar, #Kashmir
A Kashmiri Boy Keeps himself Warm Inside a Maple Tree in Srinagar #Kashmir
Road to Gulmarg,#Kashmir 
Beautiful landscape in Leh Laddakh, J&K
Beetab Valley in Pahalgam
Beautiful Harwan in Srinagar
Paradise Kashmir

जब जेल में भगत सिंह ने
उनकी माँ मिलने आई और
वो रो रही थी तो भगत ने पूछा की
माँ, क्या तुम इसलिए
रो रही हो की तुम्हारा बेटा फांसी चढने
वाला है, तुम्हारा भगत मर
रहा हैं.....?

तो उस माँ ने क्या उत्तर दिया,
उस
माँ ने कहा
भगत तू फांसी पर चढ़ रहा है इसलिए
नहीं रो रही मैं
तो अपनी कोख पर रो रही हूँ की २-4
भगत ओर होते तो उन्हे
भी भारत माता पर न्योछावर कर
देती, मैं तो इसलिए रो रही हूँ
की एक भगत ही क्यों पैदा हुआ!!

हे माँ आपके चरणो मेँ कोटि कोटि प्रणाम

Dil Ki Baat, Shayari Ke Saath

Preet Kaur


जिस देश में कन्या पूजन कि परम्परा थी, है, और रहेगी अगर उस देश में हमने ऐसा वातावरण बना दिया हो जिसमे दामिनी से लेकर आसाराम और तेजपाल जैसे काले किस्से सामने आते हो और छोटी बच्चियों से लेकर युवतियां और प्रौढ़ महिलाएं भी अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगें तो हमें ये विचार करना चाहिए कि शायद हम इंसान भी रह गए हैं या वो भी खतम होने कि प्रक्रिया में आ गए हैं! मुझे एक कवी कि लाइन याद आती है .........

"वतन कि जो हालत बताने लगेंगे तोह पत्थर भी आंसू बहाने लगेंगे!
कहीं भीड़ में खो गयी आदमियत जिसे ढूंढने में ज़माने लगेंगे !"

नारी अबला नहीं है इतिहास ये आभास दिलाता है........

भारतीय नारी जब त्रिशला बनी है तब दुनिया को महावीर नाम मिल पाता है !
जीजामाता शौर्य संस्कार के जगाती हैं तोह शिवा जी को रास्ट्रीय स्वाभिमान मिल पाता है !
देवकी यशोदा जब दुलारती हैं कान्हा को तोह दुनिया को प्यारा ब्रजधाम मिल पाता है !
केकैयी कौशल्या तपती हैं जब तपस्या में तोह दुनिया को पूजने को राम मिल पाता है!

Neeraj Mishra

कहां लोग झाड़ू को घर में छुपाकर रखते थे आज उसे सिर पर सजा कर घूम रहे हैं.. दिल्ली में आपको हर जगह आप चाहें ना चाहें लोग मोर पंख की तरह झाड़ू को सिर पर सजाए मिल जायेंगे...कुछ तो है मिस्टर केजरीवाल..!!!
सच्चाई सामने देखकर आंखे बंद नहीं की जा सकती.. आम आदमी पार्टी का असर दिल्ली में गली मुहल्लों सड़क किनारे की उन दुकानों से लेकर बड़े बड़े ऑफिसों में नज़र आ रहा है.. आम आदमी पार्टी वास्तव में एक आम मुद्दा बन गई है..कट्टर कांग्रेसी और बीजेपी को छोड़ दीजिए तो आम लोग अरविंद केजरीवाल में अपना प्रतिनिध देखते हैं...
मै किसी की क्या कहूं जब मै खुद से ये उत्तर नहीं ढूंढ पा रही कि Economic Times के सर्वे और News Express के लाइव ओपीनियन पोल में अरविंद की शख्सियत शीला पर भारी पड़ते देखकर मै खुद इतना खुश क्यों हो रही हूं...चेहरे पर मुस्कुराहट क्यों आ जाती है जब कहीं किसी फुटओवर ब्रिज पर तो कहीं किसी बस स्टैंड पर कहीं किसी सिग्नल से रोजी कमाने वालों के सिर पर वो टोपी देखती हूं...
Yashwant Singhमैने वास्तव में घर से निकलकर देखा...AAP के उन टोपी वालों में आपको सरलता दिखेगी..वो किराए के भाड़े के सैलरी पाने वाले लोग नहीं है..वो वास्तव में एक आम आदमी है..20-50 लाख का सालाना पैकेज पाने वाले भी औऱ 20-50 रुपए ही मात्र रोज़ कमाने वाले भी...उन लोगों का समझाने का अंदाज़ अलग है जिसमें तत्परता सच्चा मन और परिश्रम दिखाई देता है...जो सिर्फ पर्चे बांटना अपना काम नहीं समझते बल्कि पूरे मन से आपको मोटिवेट करते हैं....
कहीं औऱ ना सही लेकिन नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में..मुझे लगता है इस बार इतिहास बदलेगा..ज़रूर बदलेगा और अगर इस बार नहीं बदला तो शायद अगले कई दशकों में नहीं बदलेगा...
Let's cross fingers.. !!!

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