Bollywood is all about entertainment, entertainment & entertainment. No matter what, it keep surprising us every now & then. Came across this collection of 'Bollywood Amazing Pictures' & they are definitely worth a share.

Have a look at these & you will be looking at them again.


1. Anushka Sharma- The B'day Girl.





2. Hema Malini- Dharmendra





3. Jackie Shroff & Tiger Shroff





4. Sridevi- Amitabh Bachchan





5. The 'Akhtar' Family





6. Yes, we are 'matching!'






7. Shilpa Shetty & Remo?





8. Sridevi & Dharmendra





9. Einstein SRK!





10. Cover Picture!





11. Kapil Dev, Arbaaz  Khan, Shah Rukh Khan





12. Dara Singh & Akshay Kumar





13. Shreya Ghoshal





14. The Deols





15. Arjit Singh





16. Salman Khan, Hrithik Roshan & Shah Rukh Khan





17. Madhuri Dixit





18. Tanuja, Kajol & Tannisha





19. The Bachchans





20. Amitabh Bachchan & Shah Rukh Khan





21. Anupam Kher






22. Amitabh Bachchan & Madhuri Dixit 





23. Shilpa Shetty






24. Madhubala





25. Kajol





26. The Kapoor Ladies





27. Alia Bhatt- how cute!





28. Shatrughan Sinha & Sonakshi Sinha





29. Meena Kumari 





30. Ali Zafar





31. Jaaved Jaffrey






32. And in the end, this is Junior Yo Yo Honey Singh




गर्व है हमें ऐसे कर्तव्य निसठ अधिकारी पर

मेरा नमन है

नवाबाद थानाक्षेत्र के मण्डी के पास चेकिंग के दौरान समर्थक की बाइक पकडे जाने पर झांसी में एक सपा नेत्री को गुस्सा आ गया। सपा की प्रदेष कार्यसमिति सदस्य दीपमाला कुषवाहा ने मौके पर पहुंचकर दारोगा ओ पी यादव को बाइक छोडने को कहा। दारोगा ने कागज अधूरे होने के कारण बाइक छोडने की बात नहीं मानी। इसके बाद गुस्साई सपा नेत्री ने दारोगा को कहा कि तुम नेतागिरी कर रहे हो। धमकी देते हुए कहा कि हिम्मत है तो चालान करके दिखाओं। इस पर दारोगा जी ने भी पलटवार करते हुए कहा कि मैं दारोगा हूं। हिम्मत रखता हूं और चालान कर सकता हूं। सपा नेत्री और दारोगा के बीच सडक पर चल रहे इस हंगामे को देखने के लिए आसपास के लोगों की भीड जमा हो गई। काफी देर तक चले हंगामे के बाद सपा नेत्री दारोगा को देख लेने की बात कहते हुए मौके से चली गई। बाइक के कागज कम होने के कारण दारोगा ने बाइक का चालान कर दिया।(धर्मेन्द्र सिंह द्वारा सूच्नार्थ)


Rose, Propose aur Valentine ki dose (2015) 
This stand-up act represents the frustration that Indian men, or rather all men in a relationship go through. This Valentine's Day, we take you to the woes of a man frustrated by the exorbitant expenditure that guys do to keep their (better) halves satisfied.


Watch this absolutely hilarious video on how Adolf Hitler reacts to the landsliding victory of Arvind Kejriwal and AAP in Delhi Elections!



छाती की बात 
..मोदी के भाषण के बाद मैने इंटरनेट को छान मारा कि पता चले कि छाती की औसत माप क्या होती है और आर्नोल्ड शेवनेगर की छाती कितनी चौड़ी है...पता चला कि औसत पुरुष की छाती की माप 36 से 42 इंच तक होती है. दुनिया में कभी बेहतरीन बॉडी बिल्डिंग के लिए चैंपियन बने आर्नोल्ड की छाती 57 इंच की रही है, जो एक विश्व रेकार्ड है..जबरदस्त मोटे व्यक्ति की छाती का रिकार्ड 72 इंच का है.. मोदी जी की छाती की माप कितनी है ये पता नहीं.. 56 इंच चौड़ी छाती से उनका आशय क्या था ये तो पता नहीं..हो सकता है उनका भाषण लिखने वाले ने इंटरनेट से कुछ गलत तथ्य नासमझी में लिख डाला हो ..हमेशा की तरह मोदी जी ने इस पढ़ भी डाला हो. या शायद उन्होंने ये कहने की कोशिश की असल में छाती जितनी भी होती है..उसका एक अदृश्य विस्तार भी होता है.




दो दिनों से दिल्ली की सड़कों पर आम आदमी कुछ ख़ास देख रहा है..। जो पुलिस की चौखट से लेकर सरकार के हर दर पर मेमना बनने के लिए मजबूर हैं उनके विद्रोह के नारों में टीवी स्टूडियो के सुपर स्टार दरबारी गायकों सरीखे कर्णप्रिय सुर नहीं खोज पा रहे..। मीडिया के माइकों से भाग्य विधाता पत्रकार जनतंत्र के गीत गाते दिख रहे हैं..। दोनों से ताल्लुक रखने वाला मैं मूक ही रहता लेकिन जब विजय विद्रोही जी को एबीपी न्यूज़ पर डिक्शनरी खोलकर ‘anarchy’ की परिभाषा देते देखा तो रहा नहीं गया..। नाम विद्रोही होने पर भी वो ये नहीं समझ पाए कि इस शब्द के मायने शब्दकोष में नहीं इतिहास में खंगालने की ज़रुरत है..। 6 सदी ईसा पूर्व चीन में TAOISM के जनक लाओत्सु इस थीम के पहले प्रणेता कहलाते हैं..। उनके बाद के इसी लीक के दार्शनिक झुआंगजी ने लिखा, ‘एक छोटा चोर जेल जाता है, बड़ा चोर देश चलाता है..।’ क्या ऐसा नहीं लगता ये एक परिभाषा 65 सालों में पनपी हमारी व्यवस्था के लिए ही कही गई हो..? उस हिसाब से तो जेपी, अरविंद केजरीवाल असल में इस संस्थागत ANARCHY को तोड़ने वाले विरले नेता साबित होते हैं..। Georges Lechartier लिखते हैं- “The true founder of anarchy was Jesus Christ and ... the first anarchist society was that of the apostles.” बोल्शेविक क्रांति शायद ANARCHISTS के बिना कभी मुमकिन नहीं होती..। एक बार फिर हमारे हालात की याद आती है जब आप ये जानते हैं कि ANARCHIST शब्द का इस्तेमाल भर्त्सना के तौर पर पहली बार 1642 में अंग्रेज़ी गृहयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के रजवाड़ों ने संसद के लिए लड़ रहे ‘ROUNDHEAD’ क्रांतिकारियों के लिए किया था..। अफसोस ये है कि इस बार भी इतिहास खुद को सिर्फ दोहराता दिख रहा है..जबकि हमारे देश में पहली ज़रुरत इसे रचे जाने की है..। लेकिन सवाल ये है कि इस बदलाव उम्मीद किससे रखें..? जिन्हें अरबों की फीस पर काम करने वाली प्रचार कंपनियां..सजीले मंचों पर मसीहा का मुखौटा पहनाकर पेश करती हैं..उनका इतिहास कमज़ोर है और वर्तमान संदेहास्पद..। मीडिया के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना अच्छा..। आज सुबह धरनास्थल पर शौचालय खोज रहे केजरीवाल के मुंह में मीडिया ने माइक ठूंसा तो वो बोले, मीडिया को क्या हो गया है, ज़्यादातर पत्रकार अच्छे हैं, लेकिन उनके मालिक बीजेपी या कांग्रेस के हाथों बिके हैं..। सबने बयान चलाया लेकिन बेहद सफाई से मालिक वाली बात काटकर..। इतनी सी बात ही उसके समाज की आत्मा के रक्षक, 'CONSCIENCE KEEPER OF SOCIETY' होने के दावे की पोल खोलती है..। दो-तीन दिन पहले सीएनएन-आईबीएन और एनडीटीवी केजरीवाल का इंटरव्यू ले उड़े और एबीपी को नहीं मिला..। इसके बाद आप केजरीवाल के लिए इस चैनल के बदले सुर देख सकते हैं..। TIMES NOW की भी यही कहानी है..। आप जो टीवी पर देखते हैं, सुनते हैं..उसे बोलने, लिखने वाले भी उसी मिडल क्लास का हिस्सा हैं, जिसकी स्वार्थपरता पर दुनिया भर के समाजशास्त्री आपको एकमत मिलेंगे..।

मैंने सुना है अंधों के एक गांव में जब दुर्घटनावश एक आंख वाला फंस गया तो अंत में उसे भी अपनी आंखें निकलवानी पड़ीं..। क्योंकि बाकी सब लोग अगर कोई इकलौता सच देख पाए थे तो वो था अंधकार..। इतने आतातायी देखने के बाद अब इस देश की आत्मा ही शासित हो गई लगती है..। गोरे हों या काले..हुक्मरानों को ‘भाग्य विधाता’ के तौर पर देखने के आदी हो गए हैं हम..। यहां तक कि टैगोर जैसा दिमाग भी जॉर्ज पंचम के बारे में ऐसा ही गीत लिखता है..और हम उसे खुशी-खुशी राष्ट्रगीत भी बना लेते हैं..। कमज़ोर शासकों ने इतनी बार लुटवाया कि हिंदुस्तान की यही शासित आत्मा अब किसी ‘अधिनायक’ के लिए तड़पती जान पड़ती है..। आत्मा की इसी गुलामी से पनपे वो मस्तिष्क भी हैं जो टीवी चैनलों की मोटी सैलेरियों और अपनी अभिप्साओं के गुलाम हैं..। इसीलिए जब केजरीवाल यमदूत जैसे अंगरक्षकों से घिरे नहीं दिखते, जब वो लुटियन्स दिल्ली के खाए अघाए लोगों की करताल के बीच रिबन ना काटकर लोगों के बिजली कनेक्शन जोड़ते दिखते हैं तो गुलाम दिमाग उन्हें नेता ही स्वीकार नहीं कर पाते..। इसीलिए जब वो आम इंसान की तकदीर को फाइलों के जाल से निकालकर फैसलाकुन जंग में ले जाना चाहते हैं तो लोगों को लगता है कि वो प्रशासक नहीं, आंदोलनकारी हैं..। ज़रा सोचकर देखिएगा..आंदोलनकारी ही सच्चे शासक हो सकते हैं..। अन्यथा राजतंत्र को उखाड़ने की क्या ज़रुरत पड़ती..? अन्यथा पढ़ी लिखी ब्यूरोक्रेसी को ही इस देश का शासन क्यों ना सौंप दिया जाता..? अन्यथा दुनिया का मन मोहने वाले अर्थशास्त्री..इस देश में इतना ऐतहासिक अनर्थशास्त्र ना लिखते..। 

अगर एमसीडी की छत पर करीब 500 करोड़ का हैलीपैड सिर्फ मुख्यमंत्री के हैलीकॉप्टर के लिए बनता है तो वो हमारे नेताजी की कार्यकुशलता के लिए ज़रुरी कहलाया जाता है..। लेकिन जिस जनता का सचिवालय है (जिसके मेनगेट को 15 साल बाद जनता के लिए खोलने के लिए एक पूरा दिन लग जाता है!) अगर वो उसके आंगन में घुस आती है तो मेरे प्रबुद्ध मित्र भी कहते हैं लोकतंत्र की गरिमा का हनन हो गया..! एक एसएचओ जब झुग्गियों की औरतों को पीटने से पहले वारंट तो क्या, इंसानियत के तकाज़े को भी ठेंगे पर रखता है, तब आवाज़ भी नहीं उठती..। लेकिन वही एसएचओ जब हर कानून से ज़्यादा हफ्ते की ग्राहकी की फिक्र में मंत्री तक को अनसुना कर देता है तो संविधान के अनुच्छेद, धाराएं, वाक्य, शब्द तक पर ब्रह्मज्ञान देने वाले खड़े हो जाते हैं..। हां, नस्लवाद स्वीकार्य नहीं हो सकता..। लेकिन क्या हम ये स्थिति स्वीकार कर लें जहां दिल्ली ही नहीं देश के हर नागरिक के लिए फैसला करना मुश्किल हो कि वो रक्षकों से ज़्यादा डरे या भक्षकों से..? एक मंत्री का शीशा टूटे तो दर्जन पुलिसवाले सस्पेंड हो जाएं लेकिन एक औरत को ज़िंदा जला दिया जाए..तो संविधान की धाराओं को इंसाफ की राह का रोड़ा बना दिया जाए..?

लोकतंत्र बहुमत पर भले ही चले..लेकिन क्रांतियों को कभी बहुमत की ज़रुरत नहीं पड़ी..। माओ, लेनिन से लेकर कास्त्रो तक इतिहास उठाकर देख लें..बदलाव के बीज सदैव अल्पमत ने ही बोए..। बाज़ारवाद जिस दौर का आधार हो, वहां शायद अल्पमत में रहना, सच की ज़्यादा बड़ी मज़बूरी है..। लेकिन ये देश एक अहम दोराहे पर है..। एक ओर ऐसा विचार है जो कहता है कि मुझे ताकत दो ताकि आपका ‘भाग्य विधाता’ बनूं..। और दूसरी ओर ये ख्याल कि आप तक ताकत पहुंचेगी..ताकि आपका मुस्तकबिल आपके हाथ हो..। मेरे पसंदीदा ब्रेख्त के शब्दों में- “बशर्ते तय करो- किस ओर हो तुम”..!




मां गंदा सा मफलर दे दे केजरीवाल बन जाऊं,
झाड़ू लेकर हाथ में तेरी भ्रष्टाचार मिटाऊं।
एक गंदा सा एक स्वेटर दे दे पहन के उसको जाऊं,
खांस-खांस कर सबसे बोलूं भ्रष्टाचार मिटाऊं।
पढ़-लिख कर क्या होगा मां तू रखदे सभी किताबें,
तू तो बस बाजार से मुझको टोपी एक दिलवा दे।
पढ़-लिखकर भी केजरीवाल बस एक नौकरी पाए,
लेकिन चमका तभी सितारा, जब झाड़ू अपनाए।
अन्ना जी के मंच पे चढ़कर कर दिया सबको ढीला,
बीजेपी को मात दे गए डर गईं इनसे शीला।
आज बैठकर दिल्ली में वो कर रहे हैं नौटंकी,
बिजली देंगे और पानी से भरेंगेसबकी टंकी।
टी.वी पर दिन रात दिख रहे, गुम शाहरुख-सलमान,
झाड़ू थाम के भी मिल सकता है गर इतना सम्मान।
तो फिर काहे रात को जग कर पढ़-पढ़ आंखें फोढ़ूं,
मैं भी क्यों न झाड़ू लेकर उनके साथ ही दौड़ूं....।।

From: Piyusha Jha


कांशीराम के बेडरूम में घुसने पर झापड़ खाने वाला आशुतोष पूछ रहा कि फोन करने का ये कोई टाइम है!

अभी मैंने आशुतोष को फोन किया. आईबीएन7 वाले को. तो भाई ने बोला कि ये कोई टाइम है फोन करने का. मैंने पूछा- ''भइया, हां या ना में बता दो कि इस्तीफा दिया है या नहीं, क्योंकि आपकी विदाई की फोटो शेयर हो रही है फेसबुक पर''. तब भी भाई मुझे घुड़कता रहा, बोलता रहा कि... ''ये कोई टाइम है भला फोन करने का''.

हद है यार.

ये वही आशुतोष भाईसाहब हैं जो बिना बुलाए दिन दहाड़े कांशीराम के घर में ही नहींबल्कि बेडरूम में घुस गए थे और झापड़ खाकर बाहर निकले थे. और, उसी के बाद एसपी सिंह के रहमोकरम पर पत्रकार बन गए थे. पर अब यही महोदय खबर के लिए फोन किए जाने पर समय का हवाला दे रहे हैं.

बताया जा रहा है कि ये आशुतोष महाशय आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लडेंगे लोकसभा का, इसलिए पत्रकारिता नामक महान पेशे का दिल पर पत्थर रखकर महान त्याग किया है. अगर ऐसे लोगों ने आम आदमी को चपेटे में ले लिया तो खून चूसने वाले जंगली छोटे जानवरों के जीवन का क्या होगा और उन मोटे जानवरों के खून का क्या होगा जिसका इंतजार जंगली छोटे खूनपिस्सू प्राणी करते हैं.. लगता है प्रकृति का संतुलन गड़बड़ाने वाला है...

पता नहीं अरविंद केजरीवाल के पास कोई छननी बची है या नहीं या फिर दिल्ली प्रदेश में चुनाव जीतने के बाद इन 'आप' वालों की छननी छलनी-छलनी हो चुकी है... जो भी हो, वे खुद जानें.. लेकिन सैकड़ों मीडियाकर्मियों की नौकरी खाने वाले आशुतोष जैसे कार्पोरेट संपादकों की जगह आम आदमी पार्टी में हो गई तो भगवान जाने ये पार्टी कैसे आम आदमी की रह पाएगी....

सुना तो ये भी है कि आम आदमी पार्टी वाले अब अपने यहां जहाज कंपनियों के प्रबंधकों से लेकर बैंकरों तक और माफियाओं के परिजनों से लेकर पुराने गिरहकटों तक को टिकट देने को तैयार बैठे हैं. अगर ये सच है तो हम सब कुछ दिन बाद आम आदमी पार्टी के पर्चे को जहाज बनाकर आने वाले बरसात में अपने अगल-बगल की चोक गलियों नालियों में बहाया-भगाया करेंगे... या फिर उसे इतिहास अतीत की बातें मानकर रद्दी के भाव कबाड़ी साथियों को बेच बैठेंगे, ताकि किसी गरीब का तो घर चले...
पढ़ते रहिए डंके की चोट पर...

From: bhadas4media.com 
Via: Pashyanti Shukla


पार्टी का सम्मान विचारधारा से और सरकार का सम्मान निष्पक्ष विकास कार्यों और सटीक निर्णयों से होता है।

यदि हम सकारात्मक रूप से ये जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि आज "आप " ने क्या किया और यदि हम ... "आप " को एक विचार, बल्कि क्रांतिकारी विचार के रूप में मानते हैं ... , तो हमें व्यवहारिक सोच का विकास करना होगा जिसमें बंगले - गाड़ी के प्रयोग से अधिक-- इस बात पर विचार करना होगा कि यदि हमें स्वयं सुपर मैन की तरह काम करना पड़ जाए तो क्या हम बिना विशेष सुविधा के 'सुगम रूप से' काम कर पाएंगे ?
ज्यादा दूर मत जाइये, अपने घर में पड़ गयी शादी या किसी बड़े समारोह को याद कीजिए विशेषकर दिल्ली जैसी जगह पर। जब आपको बहुत सारे काम एक साथ भी करने होते थे और गुणवत्ता की चिंता भी थी। कितनी परेशानी उठानी पड़ी होगी आपको जब ज़रुरी सुविधा नदारद रही हो। लेकिन हम हैं कि खाना बनाने के लिए लगी (अच्छी) आग के धुंए को देखकर चिल्लाने लगे कि शहर में आग लगी है।

ख़ैर, अभी कहीं ये भी सुनने को मिला। …… जो पहली बार बहुत अच्छा लगा एक विचारधारा के रूप में- चाहे किसी ने भी कहा हो
नेता A > मैं फ्री भोजन दूंगा - मैं फ्री पानी दूंगा
नेता B >न मैं मुफ्त पानी की बात करूँगा , ना मुफ्त भोजन की बात करूंगा , मैं इतने रोजगार पैदा करूँगा, युवाओं को इतना सक्षम कर दूंगा, कि मेरे देश का एक-एक युवा लेने वाला नहीं, लोगो को देने वाला बने.

पार्टी का सम्मान विचारधारा से और सरकार का सम्मान निष्पक्ष विकास कार्यों और सटीक निर्णयों से होता है।

From: Ruma Verma

A Hindu saint, who was visiting river Ganges to take bath, found a group of family members on the banks, shouting in anger at each other. He turned to his disciples smiled and asked. "Why do people shout in anger shout at each other?" Disciples thought for a while, one of them said, "Because we lose our calm, we shout." "But, why should you shout when the other person is just next to you? You can as well tell him what you have to say in a soft manner," asked the saint. Disciples gave some other answers but none satisfied the other disciples. 

Finally the saint explained... "When two people are angry at each other, their hearts distance a lot. To cover that distance they must shout to be able to hear each other. The angrier they are, the stronger they will have to shout to hear each other to cover that great distance. What happens when two people fall in love? They don’t shout at each other but talk softly, Because their hearts are very close. The distance between them is either nonexistent or very small…" The saint continued, "When they love each other even more, what happens? They do not speak, only whisper and they get even closer to each other in their love. Finally they even need not whisper, they only look at each other and that’s all. That is how close two people are when they love each other." 

He looked at his disciples and said. "So when you argue do not let your hearts get distant, Do not say words that distance each other more, Or else there will come a day when the distance is so great that you will not find the path to return."



देश बदल रहा है...दांव बदलिए 
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घर से गांधीनगर एअरपोर्ट और वहां से उड़कर दिल्ली एअरपोर्ट. फिर हेलीकाप्टर से रैली स्थल के हेलिपैड पर . हेलिपैड से रैली के मंच पर. ४५-५० मिनट के अखिल भारतीय लाइव प्रवचन के बाद फिर मंच से वापस उन्ही रास्तों से होते हुए गांधीनगर के अपने घर.

जनता तक पहुँचने का ये तरीका कुछ महीने चल सकता है. चला भी है. टीआरपी भी मिली है और समर्थन भी. नेता भी पसंद किया गया है और प्रवचन का अंदाज़ भी. लेकिन देश की बदली राजनितिक सोच में ये तरीका अब थक रहा है. अब टीआरपी कम हो रही है. कवरेज घट रही है. अखिल भारतीय लाइव प्रवचन का समय भी घट रहा है. प्रवचन के बीच कामर्शियल ब्रेक भी आ रहे हैं.

भगवा मित्रों लोकसभा का दंगल अगर जीतना है तो नेता को दांव बदलना होगा. आसमान से सीधे मंच पर नही ...अब जनता के बीच सड़क पर उतरना होगा...गलियों से गुजरना होगा ...गाँव में जाना होगा. पुष्पक विमान से इस देश में राम राज नही आता ...राम राज लाना है तो धरती पर रथ उतारना होगा ....क्यूंकि दिल्ली में रामलीला का मंच अब किसी और ने छीन लिया है.

राजनीती का तरीका अब बदल रहा है ...जो अब नही बदला तो उसे वक़्त बदल देगा...चार महीने का वक़्त है ...दांव बदलिए वर्ना बाज़ी हाथ से निकल सकती है.


From: Deepak Sharma

!!! भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए 
एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग!!!

‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।

अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है। इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।

डच एनजीओ ‘हिवोस’ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं। इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। 
दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है।

‘सीएनएन-आईबीएन’ व ‘आईबीएन-7’ चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ करती है जो ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार के लिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर फंडिंग करती है।

माना जा रहा है कि ‘पनोस’ और ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ व हिंदी चैनल ‘आईबीएन-7’ न केवल अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ने’ में सबसे आगे रहे हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी ‘जीएमआर’ भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।

‘जीएमआर’ के स्वामित्व वाली ‘डायल’ कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सीएजी’ ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। 

इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ा’ है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।

……शेष अगले पोस्ट में..!!!

 (लेखक बीजेपी से जुड़े हैं)


साहब मैं इंकम टैक्स में एल डी सी हूँ । शपथ ग्रहण समारोह में लोगों से हाथ छुड़ा कर तेज़ी से निकल रहा था तभी किसी ने मज़बूती से हाथ खींच लिया । मेरे पास अरविंद केजरीवाल के बहुत किस्से हैं । एक सुना दीजिये । टाइम नहीं है । ग्यारह बजने में कुछ ही मिनट रह गए थे । मुझे लाइव कवरेज के लिए जाना था । अलग अलग लोगों से कई किस्से सुनाई दिये , क्रमश: लिख रहा हूँ । 

एल डी सी ने अरविंद की कहानी यूँ सुनाई । एक रोज़ घोर बारिश में मैं सुबह सुबह दफ़्तर पहुँचा । पानी भर गया था । मैं पी डब्ल्यू डी को फ़ोन कर बाहर आया तो देखा कि एक आदमी पतलून मोड़कर झाड़ू चला रहा है । नालियों को साफ़ कर रहा है । मुझे लगा कि दफ़्तर का चपरासी होगा । मैंने कहा कि कंप्लेन कर दिया है । तो उसने जवाब दिया कि पी डब्ल्यू डी वाले तो तीन घंटे में आयेंगे । ज़रा गटर का ढक्कन उठाने में मदद कीजिये । मैंने मदद कर दी । थोड़ी देर में पानी साफ़ हो गया । सबके आने का टाइम हो गया था । कमरे में फ़ाइल लेकर गया तो देखा कि यह तो वही है जो गटर साफ़ कर रहा है । ये तो मेरा कमिश्नर है ।


कहते कहते अरविंद से उम्र में काफी बड़े लग रहे जनाब ने कहा कि अरविंद ने हम सबको प्रेरित किया । हड़काया नहीं । समझाया कि रिश्वत मत लो । वे हम लोगों को काफी समझाते थे । तब से मैंने रिश्वत लेनी बंद कर दी । मैं हमेशा नान असेसमेंट की पोस्टिंग लेता हूँ । असेसमेंट की पोस्टिंग के लिए न तो रिश्वत देता हूँ और न लेता हूँ । 

दिल्ली पुलिस के एक सिपाही ने बैरिकेड के दूसरी तरफ़ से मुझे पकड़ लिया । कहा कि आप हमारा मसला क्यों नहीं उठाते । हमें आठ घंटे की शिफ़्ट दे दो । बच्चों के लिए क्रैश होना चाहिए । एक दिन की छुट्टी तो हो हफ्ते । हम रिश्वत नहीं लेंगे । अभी हम चौबीस घंटे काम करते हैं । कोई छुट्टी नहीं । कौन चाहता कि रिश्वत लें । जिसे बताता हूँ कि कांस्टेबल हूँ वो मुझे चोर समझता है । भाई साहब ईमानदारी की रोटी खाने का दिल करता है । आज यहाँ ड्यूटी लगी है तबीयत मस्त है । 

भागते हुए एक लड़के की आवाज़ सुनाई दी । छोटा सा लड़का होगा । मेरी बहन को जलाकर मार दिया है । कोई केस नहीं हो रहा है । 

मंच के क़रीब पहुँचने ही वाला था कि मैं डेमोक्रेसी पढ़ाती हूँ । यह सही में जनता के लिए जनता के द्वारा वाला लोकतंत्र है । मैं आज अकेले आई हूँ । देखिये इस भीड़ में अकेली बैठी हूँ । 

भाई साहब आज सतयुग आ गया है । तभी किसी ने आवाज़ दी कि आज लगता है कि कृष्ण का जन्म हो रहा है । एक ने कहा जय श्री राम । राम राज अरविंद लायेंगे । 

आप भी चुनाव लड़ जाओ । पत्रकारिता में कुछ नहीं रखा है । लोगों की सेवा करो । नहीं जी । राजनीति मैं नहीं करूँगा । अरे आप मत करना । हम आपको जीता देंगे । :) 

ये लीजिये अमरूद खाइये । आम आदमी का अमरूद । 

मैंने एक आपाई से सवाल कर दिया िक लोग आपके आचरण को देख रहे हैं । जवाब मिला कि हमें अहसास है । क्या है न जी । अभी तक हमें भ्रष्ट नेता मिले हैं तो हम भी वैसे हो गए हैं । अब ईमानदार नेता मिला है तो हम भी हो जायेंगे । 

स्टेशन की वीआईपी पार्किंग में वहाँ के कर्मचारियों के साथ बैठा था । शपथ ग्रहण से लौट कर थक गया था । गणेश ने कहा कि एक बात है गुरु जी । अरविंद की रैली में वो लोग आते हैं जिनकी तनख्वाह पंद्रह से बीस हज़ार है । मोदी की रैली में वो लोग आते हैं जिनकी तनख़्वाह पचास हज़ार से अधिक है । 

ये कहानियाँ खुद को याद दिलाने के लिए लिखीं हैं ।

लेखक के बारे में

 
हर वक्त कई चीज़ें करने का मन करता है। शौक-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर। स्कूल की मिट चुकी तमाम स्मृतियों में से एक यही लाइन बची रह गई। बाकी आज तक नहीं समझ पाया कि दस बारह सालों तक स्कूल क्यों गया? इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला। ज़ाहिर है जब मैं लिखूंगा तो वो मेरे ही व्यक्तिगत विचार कहलायेंगे किसी संस्थान के नहीं। विचारों की मॉनिटरिंग करने वाले संस्थानों से मुझे कोई सहानुभूति भी नहीं। मेरी कोई भी रचना कालजयी नहीं मानी जाए। न ही पत्रकारिता या साहित्य में योगदान के रूप में देखी जाए। मैं हिन्दी पट्टी में इन दोनों भूमिकाओं के निभाने के दायित्व से खुद को मुक्त कर चुका हूं। भारत के संविधान के तहत। कस्बा ने कई रिश्तेदारियां दी हैं। कमेंटबाज़ मेरे घर के सदस्य लगते हैं। ब्लॉग हम सब का एक मेंटल ब्लॉक है जिसके प्रखंड विकास पदाधिकारी भी हमी हैं। आमीन।


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